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मंगलवार, 6 जून 2017

तितर बितर लम्हे ...

समय की पगडण्डी पे उगी मुसलसल यादें, इक्का दुक्का क़दमों के निशान ... न खत्म होने वाला सफ़र और गुफ्तगू तनहाई से ... ये लम्हे कभी गोखरू, कभी फूल ... तो कभी चुभता हुआ दंश, जंगली गुलाब का ...    

मेहनत की मुंडेर पे पड़ा होता है
कामयाबी का एक टुकड़ा
जरूरी है नसीब का होना
सौ मीटर की इस रेस को जीतने के लिए  
या फिर ...
तेरे जूडे में जंगली गुलाब लगाने के लिए
xxx
चल तो लेता है हर कोई
पर सकून भरी रहगुज़र नहीं मिलती
सफर से लंबा यादों का बोझ
ओर यादों की पोटली में ताज़ा जंगली गुलाब
शायद शुरू हो नया रास्ता
उम्र के आखरी चौराहे से
xxx
घर के दरवाजे पर छोड़ देता हूं दफ्तर का भारीपन  
की काफी है पत्नी के कन्धों पर
गृहस्थी ओर बच्चों के बस्ते का बोझ
xxx
आखरी पढाव पे टिके रहना संभव नहीं होता     
बर्फ की तरह हथेली से पिघल जाती है कामयाबी 
पहली लहर के साथ निकल जाती है समुन्दर की रेत

नसीब फिर जरूरी हो जाता है कोसने के लिए 

सोमवार, 2 मार्च 2015

ज़िंदगी का सेल्युलाइड ...

उम्र उतरती है इंसान पर, उसके चेहरे, उसके बालों पर, उसके जिस्म पर ... पर चाह कर भी नहीं उतर पाती यादों में बसी तुम्हारी तस्वीर पर, अतीत में बिखरे लम्हों पर ... मुद्दत बाद भी बूढी नहीं हो तुम बंद आँखों के पीछे ... ये इश्क है, रुका हुआ समय या माया प्रेम रचने वाले की ...

ठीक उसी समय
जब चूम रही होती हो तुम
जंगली गुलाब का फूल
चहचहाते हैं दो परिंदे पीपल की सबसे ऊंची डाल पे
रात भी रोक लेती है शाम का आँचल
पिघलने लगता है सूरज
समुन्दर की आगोश में

ठीक उसी समय
तकिये को बाहों में दबाए
मैं भी मूँद लेता हूँ अपनी आँखें
बज उठती है ठिठकी हुई पाज़ेब कायनात की
बहने लगती है हवा फिजाओं में

"ज़िंदगी के सेल्युलाइड में कैद कुछ लम्हे
कभी पुराने नहीं होते"

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

अधूरे लम्हे ...

पता नही प्रेम है के नही ... पर कुछ करने का मन करना वो भी किसी एक की ख़ातिर ... जो भी नाम देना चाहो दे देना ... हाँ ... जैसे कुछ शब्द रखते हैं ताकत अन्दर तक भिगो देने की, वैसे कुछ बारिशें बरस कर भी नहीं बरस पातीं ... लम्हों का क्या ... कभी सो गए कभी चुभ गए ...

रात के तीसरे पहर
पसरे हुए घने अँधेरे की चादर तले
बाहों में बाहें डाल दिन के न निकलने की दुआ माँगना
प्रेम तो नहीं कह सकते इसे

किस्मत वाले हैं जिन्होंने प्रेम नहीं किया
जंगली गुलाब के गुलाबी फूल उन्हें गुलाबी नज़र आते हैं

उतार नहीं पाता ठहरी हुयी शान्ति मन में
कि आती जाती साँसों का शोर
खलल न डाल दे तुम्हारी नींद में
तुम इसे प्यार समझोगी तो ये तुम्हारा पागलपन होगा  

हर आदमी के अन्दर छुपा है शैतान
हक़ है उसे अपनी बात कहने का
तुमसे प्यार करने का भी

काश के टूटे मिलते सड़कों पे लगे लैम्प
काली हो जाती घनी धूप
आते जातों से नज़रें बचा कर
टांक देता जंगली गुलाब तेरे बालों में
वैसे मनाही तो नहीं तुम्हें चूमने की भी