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सोमवार, 19 जून 2017

कैसे कह दूं ...

सुलगते ख्वाब ... कुनमुनाती धूप में लहराता आँचल ... तल की गहराइयों में हिलोरें लेती प्रेम की सरगम ... सतरंगी मौसम के साथ साँसों में घुलती मोंगरे की गंध ... क्या यही सब प्रेम के गहरे रिश्ते की पहचान है ... या इनसे भी कुछ इतर ... कोई जंगली गुलाब ...

झर गई दीवारें
खिड़की दरवाजों के किस्से हवा हुए
मिट्टी मिट्टी आंगन धूल में तब्दील हो गया
पर अभी सूखा नहीं कोने में लगा बबूल
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

अनगिनत यादों के काफिले गुज़र गए इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर
जाने कब छिल गयी घर जाने वाली सड़क की बजरी
पर बाकी है, धूल उड़ाती पगडण्डी अभी
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कुछ मरे हुवे लम्हों की रखवाली में 
मेरे नाम लिखा टूटा पत्थर भी ले रहा है सांसें  
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया

कई दिनों बाद इधर से गुज़रते हुए सोच रहा हूँ    
हिसाब कर लूं वक़्त के साथ
जाने कब वक़्त छोड़ जाए, वक़्त का साथ

फिर उस जंगली गुलाब को भी तो साथ लेना है 
खिल रहा है जो मेरी इंतज़ार में ... 

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

सोमवार, 16 मई 2016

आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो ...

रिश्ता नया बने तो पुराना नहीं भूलो
तुम दोस्ती का फर्ज़ निभाना नहीं भूलो

जो फूल आँधियों की शरारत से हैं टूटे
उन को भी देवता पे चढ़ाना नहीं भूलो

जागे हुओं को यूँ भी उठाना नहीं आसाँ
जो सो रहे हैं उनको उठाना नहीं भूलो

इंसान हो तो साथ हो इंसानियत इतनी
तुम डूबतों को तिनका थमाना नहीं भूलो

तुमको जो आसमान को छूने की है चाहत
आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो

रविवार, 5 जुलाई 2015

दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए ...

कविताओं के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक गज़ल, आशा है आप को पसंद आएगी ...

बाज़ुओं को तोल कर बोझा उठाना सीखिए
रुख हवा का देख कर कश्ती चलाना सीखिए

गम के बादल आज हैं कल धुप होगी गुनगुनी
दर्द होठों पर छुपा कर मुस्कुराना सीखिए

ज़िंदगी देती है मौका हर किसी इंसान को
लक्ष्य पर ही भेद हो ऐसा निशाना सीखिए

वादियों की हर अदा में प्रेम का संगीत है
पंछियों के साथ मिल कर गुनगुनाना सीखिए

ज़िंदगी में क्या पता फिर कौन से हालात हों
दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए