प्रेम कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रेम कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 27 जून 2017

सुकून ...

सुकून अगर मिल सकता बाज़ार में तो कितना अच्छा होता ... दो किलो ले आता तुम्हारे लिए भी ... काश की पेड़ों पे लगा होता सुकून ... पत्थर मारते भर लेते जेब ... क्या है किसी के पास या सबको है तलाश इसकी ...


नहीं चाहता प्यार करना
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
अपने आप से किये वादों से परे

उड़ना चाहता हूं उम्मीद के छलावों से इतर
के छू सकूँ आसमां
फिर चाहे न आ सकूँ वापस ज़मीन पर

गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार    
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ    
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया  
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के 
जंगली गुलाब की यादों से अलग ... 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

सफ़र प्रेम का ...

प्रेम तो पनपता है पल पल ... समय की बुगनी को भरना होता है प्रेम से लम्हा दर लम्हा ... कहाँ होता है किसी एक दिन की औकात में उस प्रेम को समेट पाना ... क्या प्रेम का छलकना भी प्रेम है ... छोड़ो क्या सोचना ... अभी तो लम्हे हैं प्रेम है, समेटने दो ...  


कुछ भी मांग लेने के लिए
जानना चाहा कायनात ने
कैसे बनेगा एक लम्हा पूरी ज़िन्दगी

मैंने सादे कागज़ पे लिखा तुम्हारा नाम
डाल दिया ऊपरवाले की नीली पेटी में

तब से घूमता है खुदा मेरे पीछे
सब कुछ दे देने के लिए

सोचता हूँ तुम हो, प्रेम है
और क्या है जो मांग सकूं उससे  

रविवार, 19 अप्रैल 2015

चीथड़े यादों के ...

सोचो ... यदि उम्र बांटते हुए यादें संजोने के शक्ति न देता ऊपर वाला तो क्या होता ... ठूंठ जैसा खुश्क इंसान ... सच तो ये है की यादें बहुत कुछ कर जाती हैं ... दिन बीत जाता है पलक झपकते और रात ... कितने एहसास जगा जाती है ... कई बार सोचता हूँ उम्र से लम्बी यादें न हों तो जिंदगी कैसे कटे ...

पता नही वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
बेफिक्री से घुस आती हो कम्बल में
दौड़ती रहती हो फिर जिस्म की रग-रग में पूरी रात
जागते और सोएपन के एहसास के बीच
मुद्दतों का सफ़र आसानी से तय हो जाता है

अजीब सा आलस लिए आती है जब सुबह
अँधेरे का काला पैरहन ओढ़े तुम लुप्त हो जाती हो
बासी रात का बोझिल एहसास
रात होने के भ्रम से बहार नहीं आने देता

(हालांकि कह नहीं सकता ... ये भी हो सकता है की मैं उस
भ्रम से बाहर नहीं आना चाहता)

तमाम खिड़कियाँ खोलने पर भी पसरी रहती है सुस्ती
कभी बिस्तर, तो कभी कुर्सी पर
कभी कभी तो हवाई चप्पल पर
(कम्बख्त चिपक के रह जाती है फर्श से)

पता नहीं वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
पर दिन के सुजाग लम्हों में
यादों के ये चीथड़े
जिस्म से उखाड़ फैकने का मन नहीं करता ...