सोमवार, 21 अगस्त 2017

जो अपने दिल में इन्कलाब लिए बैठा है ...

वो रौशनी का हर हिसाब लिए बैठा है
जो घर में अपने आफताब लिए बैठा है

इसी लिए के छोड़नी है उसे ये आदत 
वो पी नहीं रहा शराब लिए बैठा है

पता है सच उसे मगर वो सुनेगा सब की 
वो आईने से हर जवाब लिए बैठा है

वो अजनबी सा बन के यूँ ही निकल जाएगा
वो अपने चहरे पे नकाब लिए बैठा है

दिलों के खेल खेलने की है आदत उसकी 
वो आश्की की इक किताब लिए बैठा है

करीब उसके मौत भी न ठहर पाएगी 
जो अपने दिल में इन्कलाब लिए बैठा है

सोमवार, 14 अगस्त 2017

सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे ...

सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएं ... इस पावन पर्व की पूर्व संध्या पर आज के हालात पे लिखी गज़ल प्रस्तुत है ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ...

जब तलक नापाक हरकत शत्रु की सहते रहेंगे
देश की सीमाओं पर सैनिक सदा मरते रहेंगे

पत्थरों से वार कर उक्सा रहे हैं देश-द्रोही
और कब तक हम अहिंसा मार्ग पर चलते रहंगे

मानता हूँ सिर के बदले सिर नहीं क़ानून अपना 
पर नहीं स्वीकार अपने वीर यूँ कटते रहेंगे

दक्ष हो कर आज फिर प्रतिशोध तो लेना पड़ेगा
सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे

एक ही आघात में अब क्यों नहीं कर दें बराबर 
शांति चर्चा, वार्ताएं बाद में करते रहेंगे 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

हर युग के कुछ सवाल हैं जो हल नहीं हुए ...

कविता के लम्बे दौर से निकलने का मन तो नहीं था, फिर लगा कहीं गज़ल लिखना भूल तो नहीं गया ... इसलिए आज ग़ज़ल के साथ हाजिर हूँ आपके बीच ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ... 

डूबे ज़रुर आँख के काजल नहीं हुए
कुछ लोग हैं जो इश्क में पागल नहीं हुए 

है आज अपने हाथ में करना है जो करो
कुछ भी न कर सकोगे अगर कल नहीं हुए

अब तक तो हादसों में ये मुमकिन नहीं हुआ
गोली चली हो लोग भी घायल नहीं हुए

आकाश के करीब न मिट्टी के पास ही
अच्छा है आसमान के बादल नहीं हुए

सूरज की रोशनी को वो बांटेंगे किस कदर 
सर पर कभी जो धूप के कंबल नहीं हुए

हो प्रश्न द्रोपदी का के सीता की बात हो  
हर युग के कुछ सवाल हैं जो हल नहीं हुए