बुधवार, 21 मार्च 2012

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया ...

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया
फिर अचानक सामने सर दे दिया

ले लिए सपने सुनहरी धूप के
और फिर खारा समुन्दर दे दिया

एक बस फरमान साहूकार का
छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया

लहलहाती फसल ले ली सूद में
जोतने को खेत बंजर दे दिया

नौच खाया जिस्म सबके सामने
चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
खुदकशी का नाम दे कर दे दिया

तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया